Saturday, February 10, 2007

संस्कृत विरोधी भाषण पर...

संपूर्णानंद विवि में राज्यपाल के अंग्रेजी प्रेम पर भड़के छात्र।

संपूर्णानंद संस्कृत विश्वविद्यालय का २७ वाँ दीक्षांत समारोह।

राज्यपाल के कथन "चांद पर जाना है तो अंग्रेजी पढ़ें, संस्कृत तो बैलगाड़ी के जमाने की भाषा है। इससे जीवन में तरक्की नहीं पायी जा सकती है"

 पर छात्र भड़क उठे। नारेबाजी शुरू हुई तो आनन-फानन में महामहिम को पंडाल से निकाला जाने लगा। इस पर उत्तेजित लोगों उनकी तरफ न केवल जूते-चप्पल बल्कि कुर्सियां भी फेंकी, कार पर पथराव किया। इतना ही नहीं बयान के विरोध में छात्रों ने डिग्रियां फाड़ना शुरू कर दिया और वहां रखे गमलों को तोड़ना शुरू कर दिया। क्रोधित छात्रों को नियंत्रित करने के लिए पुलिस को बल प्रयोग करना पड़ा। राज्यपाल के जाने के बाद छात्रों ने कुलपति आवास को निशाना बनाया। पथराव के साथ ही अंदर घुसकर तोड़फोड़ भी की। राज्यपाल का पुतला भी फूंका गया।

बवाल उस समय शुरू हुआ जब कुलाधिपति ने अपने अध्यक्षीय उद्बोधन में पहले से अंग्रेजी में तैयार नोट्स पढ़ने के बजाय हिन्दी में बोलना शुरू किया। उन्होंने कहा,जमाना बदल रहा है।

केवल संस्कृत में परास्नातक (पोस्ट ग्रेजुएट) आदि की डिग्री लेने से ही काम नहीं चलेगा। संस्कृत पढ़कर सिर्फ टीचर व पंडित तो बना जा सकता है लेकिन आईएएस बनने तथा दिल्ली व विलायत जाने के सपने को साकार नहीं किया जा सकता। इस डिग्री से छात्रों का भला होने वाला नहीं है। संस्कृत एक विषय (सब्जेक्ट) जरूर हो सकता है लेकिन दो से तीन लाख रुपये माह कमाने का यह जरिया नहीं हो सकता। राजेस्वर ने सवाल उठाया कि आखिर इस डिग्री से क्या फायदा हो सकता है?

इसके लिए छात्र अपनी सोच बदलें और अंग्रेजी अनिवार्य रूप से पढ़ें। कुलाधिपति ने कहा,संस्कृत विश्वविद्यालय में भी अंग्रेजी की अनिवार्य रूप से पढ़ाई हो, इसके लिए विश्वविद्यालय अधिनियम में संशोधन किया जायेगा। सिर्फ संस्कृत भाषा के लिए विश्वविद्यालय की स्थापना का कोई औचित्य नहीं है। उन्होंने कहा, जिस तरह से यूरोप में लैटिन व ग्रीक अब अनिवार्य नहीं है उसी तरह संस्कृत एक विषय तो हो सकती है लेकिन पूरी डिग्री नहीं बन सकती।

 

तेलुगु, कन्नड़, मलयालम, तमिल की तरह संस्कृत भी परंपरागत भाषा है।

 कुलाधिपति का भाषण खत्म होते ही पूरे पंडाल में आक्रोश का ज्वार उबल पड़ा और नारेबाजी शुरू हो गयी। इससे परंपरागत शिष्ट यात्रा की वापसी भी नहीं हो सकी। भारी सुरक्षा के बीच राज्यपाल को समारोह स्थल से बाहर निकालते वक्त उनकी ओर न केवल जूता-चप्पल अपितु कुर्सियां उछाली जाने लगीं। हालांकि कुलाधिपति बाल-बाल बच गये लेकिन उनकी कार पर भी पथराव हुआ।

बाद में पुलिस ने छात्रों को दूर तक खदेड़ा और लाठियाया। इस बीच आक्रोश से भरे छात्रों ने अपना गोल्ड मेडल व उपाधियां हवा में उछालीं तो कुछ ने उपाधियां फाड़कर फेंक दी। इतना ही नहीं मंच पर लगा माइक तथा वहां रखे गमले तोड़ने तथा मोटरसाइकिलें क्षतिग्रस्त करने के साथ ही परिसर के पूर्वी गेट पर कुलाधिपति का प्रतीक पुतला भी फूंका गया।

दैनिक जागरण इलाहाबाद संस्करण से।

आप भी कुछ कहना चाहेंगे..

13 comments:

Atul Arora said...

अब इस विषय पर अनगिनत पन्ने , असंख्य ब्लाग बीसीयो मैसेज बोर्ड रंगे जा चुके हैं। मामला हिंदी से भी जुड़ा है। कल इस विषय पर एक मित्र ने अपना अनुभव बाँटा जब उनकी इंजीनियरिंग टीम दसेक साल पहले जापान किसी प्रशिक्षण पर गयी। सारे जापानी टूटी फूटी हिंदी में प्रशिक्षण देने लगे। किसी प्रबुद्ध इंजीनियर ने कहा कि भाई हमने इंजीनियरिंग हिंदी मे नही पढ़ी, अँग्रेजी तर्जुमा करो। जापानियों का जवाब था, सिर्फ तुम्हारे लिये हमने हिंदी सीखी है। हमें अंग्रजी न आती है न हम सीखेंगे। अब तुम या तो हिंदी मे प्रशिक्षण लो या जापानी में।

Pramendra Pratap Singh said...

राज्‍यपाल की भाषा जब से बने है तब से मर्यादित नही नही है, राज्‍यपाल सदैव ही एक पार्टी के पतिनिधि के रूप मे ही काम कर रहे है। जैसा कि मैने एक स्‍थानीय समाचान पत्र मे राज्‍य पाल के खिलाफ ऐसे शब्‍दो के प्रयोग के खिलाफ रहा था किन्‍तु आज मुझे यह कहने मे संकोच नही हो रहा है।
राज्‍यपाल प्रदेश के महामहीम है उन्‍हे महामहहीम पद की गरिमा बनाऐ रखनी चाहिये ठीक है आपका सरकार के प्रति कडे रूख का सर्मथन कर है किन्‍तु यही सर्मथन करने बाले वक्‍त पडने पर सम्‍मान की मर्यादा भी तोड़ सकते है।
संस्‍कृत हमारी देव भाषा है, तथा यी एक रूप से भारत के अन्‍य प्रदेशिक भाषाओं के साथ समंजस्‍य बैठाने का काम करती है। सभी प्रदेशिक भाषाओं शब्‍द कोश संस्‍कृत से काफी मिलते है। पी महमहीम को लगता है चॉंद पर अग्रेजी ही बोली जायेगी तो भारत सरकार से अनुरोध है कि महामहीम को अविलम्‍ब चॉंद पर भेजा जाये और चॉद के भारतीय हिस्‍से का राज्‍य पाल घोषित कर दिया जाये

Anonymous said...

नौकरशाहों को राज्यपाल बनाने पर इस तरह की मूर्खताओं का प्रदर्शन होगा ही ।राज्य के सभी विश्वविद्यालयों के पदेन कुलाधिपति होने के कारण शैक्षिक समाज ऐसे उद्गार झेलने के लिए अभिशप्त है।
कल ही बनारस के दूसरे विश्वविद्यालय,'महात्मा गांधी काशी विद्यापीठ' के दीक्षान्त समारोह में इन्हीं महानुभाव ने कह दिया कि 'गांधी-अध्ययन की कोई जरूरत नहीं है,अंग्रेजी पढ़िए'।
पाणिनी के व्याकरण -सूत्रों के गणितीय-आधार पर मेरे एक कम्प्यूटर विशेषज्ञ को बहुत रुचि थी और इस वजह से भी वह संस्कृत के प्रति आकर्षित था।काश वह इन पूर्व नौकरशाह(महिमामण्डित 'बाबू') की क्लास ले पाता !

Anonymous said...

मेरी दृष्टी ने विद्यार्थीयो ने गलत नही किया !

Prabhakar Pandey said...

जो हुआ अच्छा नहीं हुआ क्योंकि बदनाम हुई देववाणी और एक भारतीय गौरवपूर्ण पद । (छात्र और राज्यपाल तो बच निकलेंगे)

Anonymous said...

महामहिम जी, काश आप छात्रों को बता पाते कि कम्प्यूटर विज्ञान के आर्टिफ़िशियल इंटेलिजेंस में देवभाषा संस्कृत किस प्रकार से उपयोगी है. काश आप भाषा की वैज्ञानिकता से छात्रों का परिचय करा पाते.

उन्मुक्त said...

महामहिम को इस तरह के विवाद से बचना चाहिये था। अपनी भाषा अपनी संस्कृत का सम्मान हमारे ऊपर है।

Anonymous said...

यह सब अपने आपको ज्ञानी व सामने वाले को मूर्ख समझने के कारण हुआ है.

आप जिस कामके लिए जाते हो उसी की निंदा करते हो तो मूर्ख आप ही हुए. महामहीम(!) शायद अब इस बात को समझ जाएंगे.

ePandit said...

सही बात है, यद्यपि छात्रों को तोड़-फोड़ नहीं करनी चाहिए थी, परंतु इससे बुरी बात क्या हो सकती है कि राज्यपाल महोदय देश के सबसे पुराने संस्कृत विश्वविद्यालयों में से एक संपूर्णानन्द संस्कृत विश्वविद्यालय में ही संस्कृत के विरोध में बोल रहे थे। उस पर यदि वे सभ्य शब्दों में समझाते कि संस्कृत के साथ-साथ इंग्लिश भी पड़ो तो कोई बात नहीं थी, लेकिन वे तो संस्कृत का अपमान करने लगे।

प्रमेन्द्र जी ने सही कहा उन्हें चांद पर भेज देना चाहिए।

Anonymous said...

हे हे ... चान्द पर जाना है तो अंगरेजी नही रशियन सीखिये... जैसे की नासा वालों ने किया था :)

जी हाँ, मीर अंतरिक्ष स्टेशन पर जाने के लिये अमेरिकी लोगों को रशियन सीखना पङा था, क्यों की मीर पर सब रशियन ही बोलते थे :)

अनुनाद सिंह said...

राज्यपाल महोदय ने उच्च कोटि की मूर्खतापूर्ण बात कही है। यह उनकी आत्महीनता का परिचायक है। ऐसे लोग देश को क्या रास्ता दिखा सकते हैं?

उनको शायद पता नहीं होगा कि सबसे पहले किसी इंगलिस्तान का यान चन्द्रमा पर नहीं गया, बल्कि रूसी यान गया; और इसका श्रेय रूसियों की गणित और 'कन्ट्रोल थिअरी' में सिद्धहस्तता को दिया जाता है, न कि किसी भाषा को। अनेकानेक क्षेत्रों में जर्मन, जापानी, फ़्रान्सीसी आदि अंगरेजों से आगे हैं और आगे रहे हैं।

भगवान महामहिम को सदबुद्धि दें।

अनुनाद सिंह said...

यह नयी-नयी लिंक शायद महामहिम के लिये उपयुक्त है:

:

Thinking Allowed - Sanskrit Tradition

http://www.dailymotion.com/video/x4ush_thinking-allowed-sanskrit-

Anal Kumar said...

यह लिंक शायद महामहिम के लिये उपयुक्त है:
Anal Kumar - Sanskrit and Ambedkar ( अनल कुमार - संस्कृतम् अम्बेदकरश्‍च )
http://analkumar.blogspot.com/search?updated-min=2009-01-01T00%3A00%3A00-08%3A00&updated-max=2010-01-01T00%3A00%3A00-08%3A00&max-results=13