Saturday, January 24, 2009

ANother Poem by Charu Puri

ki phir aaj
gaamein aashak
bahaayein hain
aankhoon se chaalkein hain
peymanien mein uteer aayein hain

कि फिर आज
गम-ए-अश्क
बहाये हैं
आँखों से छलकते हैं
पैमाने मे उतर आये हैं।

seesaktee hai aah
dard machalta hai
aab aashk hai kee
peymanein see bhi jhalaktaa hai

सिसकती है आह
दर्द मचलता है
आब-ए-अश्क है के
पैमाने से भी झलकता है।

ummed aab doohndlee se
najar aate hai
tere aagoosh mein
garam saasein
seemaat see aatein hain

उम्मीद अब धुंधली सी
नज़र आती है
तेरे आगोश मे
गरम सांसें
सिमट सी आती हैं।

aaaarjoo phir dam bharti hai
tere perchaiye hai ke choo
ke mughe sunder karte hai

आरजू फ़िर दम भरती है
तेरी परछाई है कि छू
के मुझे सुन्दर करती है

aab tamanaa hai
kee maachal jaaoon
tu aaye
aur...........

अब तमन्ना है
कि मचल जाऊँ
तू आये
और....

aagar mein kahoon kee
mughe tera intejar nahi thaa
too ghooth hogaa
muskurahaat palkoon pee
uteer aaye
aagar tu milne aa jaye

अगर मै कहूँ कि
मुझे तेरा इन्तज़ार नहीं थी
तो झूठ होगा
मुस्कुराहट पलकों पे
उतर आयी
अगर तू मिलने आ जाये

khudaa jaane
khudaa kee manjuree
jo thee aadoore
ghajal
tere ehsas ne kar dee puree

खुदा जाने
खुदा की मंजूरी
जो थी अधूरी
गज़ल
तेरे एहसास ने कर दी पूरी।
RC Mishra (PhD)
Rega Institute for Medical Research
KU Leuven, Leuven Belgium
http://cwisdb.kuleuven.be/persdb-bin/persdb?lang=E&oproep=persoon&fnaam=58873

4 comments:

Gyan Dutt Pandey said...

बहुत दिनों बाद दिखी आपकी पोस्ट।

dwij said...

प्रस्तुति के लिए आभार

गणतंत्र दिवस की हार्दिक शुभकामनाओं सहित

सादर

द्विजेन्द्र द्विज

Udan Tashtari said...

आपको एवं आपके परिवार को गणतंत्र दिवस पर हार्दिक बधाई एवं शुभकामनाऐं.

Ek Shehr Hai said...

आपकी कविता सुनकर बीते दिनों के वे शब्द आ गए जिनको लेकर कभी दोस्तों के बीच मे अपनी पहचान हम हर रोज़ बनाया करते थे। वे महफ़िले दिमाग की खिड़कियों मे खड़ी हो गई जिसमे कभी छोटी-छोटी घटनाये भी कविताओं मे खेल जाती थी।

कुछ लोगों ने की कोशिश मुझे बनाने की
मगर, पड़ गए शब्द कम उनके पैमाने मे
बहुत बचाकर रखा था जिस मूरत को मैं अपनी
कमबख़्त वो ही चूर गई, भागदौड़ के जमाने में।