Sunday, August 05, 2007

गीता । Gita - भगवद्गीता । Bhagvadgita - अध्याय ३: श्लोक १४-१५। यज्ञ एवं नक्षत्र चक्र

Chapter 3: Verse 14-15

Subject: Yajna and Cosmic Cycle

विषय: यज्ञ एवं नक्षत्र चक्र

अन्नाद्भवन्ति भूतानि पर्जन्यादन्नसम्भव: ।
यज्ञाद्भवति पर्जन्यो यज्ञ: कर्मसमुद्भव: ॥३-१४॥

 

All beings are born of food (all living beings depend on food); from rain food is produced; rain comes from sacrifice; and sacrifice is born of action.

सम्पूर्ण प्राणी अन्न से उत्पन्न होते हैं, अन्न की उत्पत्ति वृष्टि से होती है, वृष्टि यज्ञ से होती है और यज्ञ विहित कर्मों से उत्पन्न होने वाला है ॥१४॥


कर्म ब्रह्मोद्भवं विध्दि ब्रह्माक्षरसमुद्भवम् ।
तस्मात्सर्वगतं ब्रह्म नित्यं यज्ञे प्रतिष्ठितम् ॥३-१५॥

 

Know that action originates from Brahma (scriptures) and Brahma from the Imperishable. Thus the all pervading Brahman (Devine knowledge) is ever established in sacrifice (action/service with a sense of sacrifice).

Lesson: Cosmic-cycle revolves with cooperative-action where- in all forces, which are interdependent, sacrifice for each other.

कर्मसमुदाय को तू वेद से उत्पन्न और वेद को अविनाशी परमात्मा से उत्पन्न हुआ जान। इससे सिद्ध होता है कि सर्वव्यापी परम अक्षरं परमात्मा सदा ही यज्ञ में प्रतिष्ठित है ॥१५॥

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