Tuesday, July 03, 2007

श्रीमद्भगवद्गीता । Shrimadbhagvadgita: अध्याय २: श्लोक ४४-४५। अस्थिर मन और मूलभूत गुण

Chapter 2: Verse 44-45

 

Subject: Instable Mind

विषय: अस्थिर चित्त


भोगैश्वर्यप्रसक्तानां तयापहृतचेतसाम्।
व्यवसायात्मिका बुद्धिः समाधौ न विधीयते॥२-४४॥


Those persons are devoid of stable intellect and firm determination (single-pointed conviction) who are more attached to carnal pleasures and worldly prosperity and who remain obsessed by such things.


Lesson: Persons attached to carnal pleasures and who remain obsessed by worldly things have instable mind.

उस वाणी द्वारा जिनका चित्त हर लिया गया है, जो भोग और ऐश्वर्य में अत्यन्त आसक्त हैं, उन पुरुषों की परमात्मा में निश्चियात्मिका बुध्दि नहीं होती। ॥४४॥

 

Subject: Constituent Qualities

विषय: मौलिक गुण


त्रैगुण्यविषया वेदा निस्त्रैगुण्यो भवार्जुन।
निर्द्वन्द्वो नित्यसत्त्वस्थो निर्योगक्षेम आत्मवान्॥२-४५॥


The Vedas (scriptures) deal with three constituent qualities (natural attributes like Sat, Raj, Tama found in all substances). Rise above these three qualities O Arjuna, be free from the conflict (duality) of pleasures and pains, gains and protection; ever poised in the quality of Sattva without (any desire for) acquisition and preservation (yogakshema) and be possessed of the Self.

Lesson: Three constituent qualities are found in all substances (satva, rajas, tamas). Possessed of the Self, one should ever be poised in the quality of sattva (purity) without any desire of acquisition, accumulation and preservation/protection of worldly possessions.

हे अर्जुन! वेद उपर्युक्त प्रकार से तीनों गुणों के कार्य रूप समस्त भोगों एवं उनके साधनों का प्रतिपादन करने वाले हैं, इसलिए तू उन भोगों एवं उनके साधनों में आसक्तिहीन, हर्ष-शोकादि द्वंद्वों से रहित, नित्यवस्तु परमात्मा में स्थित योग (अप्राप्त की प्राप्ति का नाम 'योग है।) क्षेम को (प्राप्त वस्तु की रक्षा का नाम 'क्षेम है।) न चाहने वाला और स्वाधीन अन्त:करण वाला हो। ॥४५॥

  चिट्ठाजगत अधिकृत कड़ी

श्रीमद्भगवद्गीता । Shrimadbhagvadgita: अध्याय २: श्लोक ४४-४५। अस्थिर मन और मूलभूत गुण

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