Wednesday, July 25, 2007

गीता । Gita - भगवद्गीता । Bhagvadgita - अध्याय ३ श्लोक ५-६। गर्व-दम्भ

न हि कश्चित्क्षणमपि जातु तिष्ठत्यकर्मकृत्।
कार्यते ह्यवशः कर्म सर्वः प्रकृतिजैर्गुणैः॥३-५॥

 
Because, even for a moment, none remains without performing action. Indeed, all are made to work helplessly by the qualities born of nature.

नि:संदेह कोई भी मनुष्य किसी भी काल में क्षणमात्र भी बिना कर्म किए नहीं रहता क्योंकि सारा मनुष्य समुदाय प्रकृति जनित गुणों द्वारा पर वश हुआ कर्म करने के लिए बाध्य किया जाता है। ॥५॥

Subject: The Hypocrite

विषय: दम्भी-घमन्डी

कर्मेन्द्रियाणि संयम्य य आस्ते मनसा स्मरन्।
इन्द्रियार्थान्विमूढात्मा मिथ्याचारः स उच्यते॥३-६॥

 

One who forcefully restraints the organs-of-action, but whose mind continues to brood over the sense-objects, is of deluded mind; and he is called a hypocrite.

Lesson: His mind is deluded and he is a hypocrite who is attached to sense-objects, having forcefully controlled organs-of-action.

जो मूढ़ बुद्धि मनुष्य समस्त इन्द्रियों को हठपूर्वक ऊपर से रोककर मन से उन इन्द्रियों के विषयों का चिन्तन करता रहता है, वह मिथ्याचारी अर्थात दम्भी कहा जाता है। ॥६॥

गीता । Gita - भगवद्गीता । Bhagvadgita - श्रीमद्भगवद्गीता । Srimadbhagvadgita: अध्याय ३ श्लोक ५-६। गर्व-दम्भ

2 comments:

परमजीत बाली said...

यह मौन क्यूँ?

RC Mishra said...

परम जीत जी, ये श्लोक व्याख्या सहित http://gita.rcmishra.net पर उपलब्ध थे, इसलिये मैने किवल लिन्क दिया था। नारद पर जब वह चिट्ठा जोड़ने को कहा तो उन्होने फीड बर्नर से फीड मांगी, जो मै भारत पहुँच कर कर दूंगा।
असुविधा के लिये खेद और ध्यान दिलाने के लिये धन्यवाद स्वीकार कीजिये।