Friday, July 20, 2007

गीता । Gita - भगवद्गीता । Bhagvadgita - तृतीय अध्याय: कर्म योग- श्लोक १-२

Third Chapter: 'Eternal duties of human beings' Verse 1-2

ज्ञानयोग और कर्मयोग के अनुसार अनासक्त भाव से नियत कर्म करने की श्रेष्ठता का निरूपण

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अर्जुन उवाच।
Arjuna said:

Subject: Confusion and Curiosity

विषय: भ्रम एवं जिज्ञासा

ज्यायसी चेत्कर्मणस्ते मता बुद्धिर्जनार्दन।
तत्किं कर्मणि घोरे मां नियोजयसि केशव॥३-१॥

O Janardana, if the path of steady intellect (transcendental wisdom) is superior to (desire less) action, why then O Kesava, you urge me to engage in this horrible action (war).

अर्जुन बोले- हे जनार्दन! यदि आपको कर्म की अपेक्षा ज्ञान श्रेष्ठ मान्य है तो फिर हे केशव! मुझे भयंकर कर्म में क्यों लगाते हैं? ॥१॥

व्यामिश्रेणेव वाक्येन बुद्धिं मोहयसीव मे।
तदेकं वद निश्चित्य येन श्रेयोऽहमाप्नुयाम्॥३-२॥

Your equivocal words appear to confuse me. Tell me decisively, the one by which I may attain the highest good (the Supreme)
Lesson: Delusion creates confusion and a confused person fails to distinguish between right or wrong. Also, he is ever curious to know about the reality (the truth).

आप अपने इस प्रकार के वचनों से मेरी बुध्दि को सम्मोहित सा कर रहे हैं। इसलिए उस एक बात को निश्चित करके कहिए जिससे मैं कल्याण को प्राप्त हो जाऊं ॥२॥

गीता । Gita - भगवद्गीता । Bhagvadgita - श्रीमद्भगवद्गीता । Srimadbhagvadgita: तृतीय अध्याय: कर्म योग- श्लोक १-२

2 comments:

Udan Tashtari said...

हरी ओम!!

RC Mishra said...

समीर जी,
'हरि ॐ तत्सत्'
धन्यवाद।