Thursday, July 19, 2007

गीता । Gita - भगवद्गीता । Bhagvadgita - अध्याय २: श्लोक ७२ । ब्रह्म ज्ञान

Chapter 2: Verse 72

Subject: Knowledge of Absolute

विषय: परम ज्ञान


एषा ब्राह्मी स्थितिः पार्थ नैनां प्राप्य विमुह्यति।
स्थित्वास्यामन्तकालेऽपि ब्रह्मनिर्वाणमृच्छति॥२-७२॥
 
O Partha! this is the state of being established in Brahman (when one has realized the Supreme).On attaining this state none is deluded. If he continues to live in this state till his last breath, he attains oneness with the Absolute.

Lesson: Knowing the Absolute is the real knowledge.

हे अर्जुन! यह ब्रह्म को प्राप्त हुए पुरुष की स्थिति है, इसको प्राप्त होकर योगी कभी मोहित नहीं होता और अंतकाल में भी इस ब्राह्मी स्थिति में स्थित होकर ब्रह्मानन्द को प्राप्त हो जाता है। ॥७२॥

 

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ॐ तत्सदिति श्रीमद्भगवद्गीतासूपनिषत्सु ब्रह्मविद्यायां
योगशास्त्रे श्रीकृष्णार्जुनसंवादे सांख्ययोगो नाम द्वितीयोऽध्याय: ॥२॥

Here ends the second chapter of Bhagvadgita named Sankhya Yoga i.e. The Eternal Reality of Souls's Immortality

इस प्रकार श्रीमद्भगवद्गीता का ब्रह्मविद्या-योगशास्त्र सम्बन्धित श्रीकृष्ण अर्जुन संवादयुक्त साङ्ख्य योग नामक द्वितीय अध्याय समाप्त होता है।

 

गीता । Gita - भगवद्गीता । Bhagvadgita - श्रीमद्भगवद्गीता । Srimadbhagvadgita: अध्याय २: श्लोक ७२ । ब्रह्म ज्ञान

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