Wednesday, July 18, 2007

गीता । Gita - भगवद्गीता । Bhagvadgita - अध्याय २: श्लोक ७०-७१ । वास्तविक शान्ति

Chapter 2: Verse 70-71

Subject: Steady Intellect

विषय: स्थिर चित्त

आपूर्यमाणमचलप्रतिष्ठं
समुद्रमापः प्रविशन्ति यद्वत्।
तद्वत्कामा यं प्रविशन्ति सर्वे
स शान्तिमाप्नोति न कामकामी॥२-७०॥

That person of steady intellect remains stable and passionless when desires enter in to his mind as the water of countless rivers flows into the brimmed ocean without causing it any vacillation. And this great person attains highest peace; not the one that has desires to fulfill desires.

Lesson: The man of steady intellect, who remains unaffected by desires, attains highest peace.

जैसे नाना नदियों के जल सब ओर से परिपूर्ण, अचल प्रतिष्ठावाले समुद्र में उसको विचलितन करते हुए ही समा जाते हैं, वैसे ही सब भोग जिस स्थितप्रज्ञ पुरुष में किसीप्रकार का विकार उत्पन्न किए बिना ही समा जाते हैं, वही पुरुष परम शान्ति को प्राप्त होता है, भोगों को चाहने वाला नहीं। ॥७०॥

Subject: Real Peace

विषय: वास्तविक शान्ति

विहाय कामान्यः सर्वान्पुमांश्चरति निःस्पृहः।
निर्ममो निरहङ्कारः स शान्तिमधिगच्छति॥२-७१॥

 
One who abandons all desires and who is devoid of longing, ego and a desire attains peace.

Lesson: Renunciation of ego-centric misconception leads to real peace.

जो पुरुष सम्पूर्ण कामनाओं को त्याग कर ममतारहित, अहंकाररहित और स्पृहारहित हुआ विचरता है, वही शांति को प्राप्त होता है अर्थात वह शान्ति को प्राप्त है। ॥७१॥

 

गीता । Gita - भगवद्गीता । Bhagvadgita - श्रीमद्भगवद्गीता । Srimadbhagvadgita: अध्याय २: श्लोक ७०-७१ । वास्तविक शान्ति

3 comments:

ज़ाकिर अली ‘रजनीश’ said...

बधाई। आपने गीता को सरल भाषा में उप्लब्ध कराकर एक पुनीत कार्य किया है।

परमजीत बाली said...

बहुत सहज शब्दों मे अर्थ लिखा है।बधाई।

RC Mishra said...

जाकिर अली और परम जीत जी,
उत्साहवर्धन ने लिये शुक्रिया।