Monday, July 16, 2007

गीता । Gita - भगवद्गीता । Bhagvadgita - अध्याय २: श्लोक ६६-६७ । प्रसन्न पुरुष एवं इन्द्रिय नियन्त्रण

Chapter 2: Verse 66-67

Subject: Contented Person

विषय: प्रसन्न पुरुष

नास्ति बुद्धिरयुक्तस्य न चायुक्तस्य भावना।
न चाभावयतः शान्तिरशान्तस्य कुतः सुखम्॥२-६६।
 
He neither has good intellect nor any sense of theism who does not contemplate with the Supreme. Such a man of atheistic nature does not have peace. How can there be peace to the peace less?
Lesson: By contemplating with the Supreme with a sense of theism, one can attain inner tranquility and contentment.

न जीते हुए मन और इन्द्रियों वाले पुरुष में निश्चयात्मिका बुध्दि नहीं होती और उस अयुक्त मनुष्य के अन्त:करण में भावना भी नहीं होती तथा भावनाहीन मनुष्य को शान्ति नहीं मिलती और शान्तिरहित मनुष्य को सुख कैसे मिल सकता है? ॥६६॥

Subject: Unbridled Sense –Organs

विषय: अनियन्त्रित इन्द्रियाँ

इन्द्रियाणां हि चरतां यन्मनोऽनुविधीयते।
तदस्य हरति प्रज्ञां वायुर्नावमिवाम्भसि॥२-६७॥
 
As a boat floating on the water is carried away by stormy wind, the mind of a person (not contemplated with the Supreme) is taken away by a single sense –organ( to which he is deeply attached) from amongst the wavering and undisciplined sense-organs.
Lesson: It is not good to leave the sense-organs unrestrained for a purposeful life and enduring success.

क्योंकि जैसे जल में चलने वाली नाव को वायु हर लेती है, वैसे ही विषयों में विचरती हुई इन्द्रियों में से मन जिस इन्द्रिय के साथ रहता है, वह एक ही इन्द्रिय इस अयुक्त पुरुष की बुध्दि को हर लेती है। ॥६७॥

 

गीता । Gita - भगवद्गीता । Bhagvadgita - श्रीमद्भगवद्गीता । Srimadbhagvadgita: अध्याय २: श्लोक ६६-६७ । प्रसन्न पुरुष एवं इन्द्रिय नियन्त्रण

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