Saturday, July 14, 2007

गीता । Gita - भगवद्गीता । Bhagvadgita : अध्याय २: श्लोक ६४-६५।अन्त:करण की प्रसन्नता

Chapter 2: Verse 64-65

Subject: inner tranquility

विषय: अन्त:करण की प्रसन्नता


रागद्वेषविमुक्तैस्तु विषयानिन्द्रियैश्चरन्।
आत्मवश्यैर्विधेयात्मा प्रसादमधिगच्छति॥२-६४॥


प्रसादे सर्वदुःखानां हानिरस्योपजायते।
प्रसन्नचेतसो ह्याशु बुद्धिः पर्यवतिष्ठते॥२-६५॥
 

But, he attains inner tranquility, even if he enjoys sensory pleasures, whose heart is independent; who neither has any attraction nor aversion; and whose sense-objects are under complete control.  All his sorrows are destroyed in that tranquility and the intellect of such a tranquil-minded person soon becomes completely steady.


Lesson: A person may have steady intellect and inner tranquility even if he enjoys sensory pleasures provided his sense objects are under complete control and whose heart is independent.

परंन्तु अपने अधीन किए हुए अन्त:करण वाला साधक अपने वश में की हुई, राग-द्वेष रहित इन्द्रियोंद्वारा विषयों में विचरण करता हुआ अन्त:करण की प्रसन्नता को प्राप्त होता है। ॥६४॥

अन्त:करण की प्रसन्नता होने पर इसके सम्पूर्ण दु:खों का अभाव हो जाता है और उस प्रसन्नचित्त वाले कर्मयोगी की बुध्दि शीघ्र ही सब ओर से हटकर एक परमात्मा में ही भलीभांति स्थिर हो जाती है। ॥६५॥

 

गीता । Gita - भगवद्गीता । Bhagvadgita - श्रीमद्भगवद्गीता । Srimadbhagvadgita: अध्याय २: श्लोक ६४-६५।अन्त:करण की प्रसन्नता

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