Thursday, July 12, 2007

गीता । Gita - भगवद्गीता । Bhagvadgita : अध्याय २: श्लोक ६१-६२। स्थिर चित्त एवं आसक्ति

Chapter 2: Verse 61-62

Subject: Steady Intellect

विषय: स्थिर चित्त

तानि सर्वाणि संयम्य युक्त आसीत मत्परः।
वशे हि यस्येन्द्रियाणि तस्य प्रज्ञा प्रतिष्ठिता॥२-६१॥

 
His intellect is steady who while controlling them all (sense-organs) remains concentrated on Me as the Supreme by completely  overcoming his senses.
Lesson: One who concentrates on the Supreme, having controlled his senses, have  steady intellect.

इसलिए साधक को चाहिए कि वह उन सम्पूर्ण इन्द्रियों को वश में करके समाहित चित्त हुआ मेरे परायण होकर ध्यान में बैठे क्योंकि जिस पुरुष की इन्द्रियां वश में होती हैं, उसी की बुध्दि स्थिर हो जाती है॥६१॥

Subject: Affect of Sensory Attachment

विषय: आसक्ति के प्रभाव

ध्यायतो विषयान्पुंसः सङ्गस्तेषूपजायते।
सङ्गात्संजायते कामः कामात्क्रोधोऽभिजायते॥२-६२॥
 
One who dwells on sense- objects, gets attached to sensory attachment. From attachment, desires are born and anger arises when there are impediments in the fulfillment of desires.

विषयों का चिन्तन करने वाले पुरुष की उन विषयों में आसक्ति हो जाती है, आसक्ति से उन विषयों की कामना उत्पन्न होती है और कामना में विघ्न पडने से क्रोध उत्पन्न होता है। ॥६२॥

 

गीता । Gita - भगवद्गीता । Bhagvadgita - श्रीमद्भगवद्गीता । Srimadbhagvadgita: अध्याय २: श्लोक ६१-६२। स्थिर चित्त एवं आसक्ति

3 comments:

mamta said...

ये उपदेश आज भी उतने ही महत्वपूर्ण है ।

alakhniranjan said...

योग वशिष्ठ में श्रीराम को उपदेश देते हुए वशिष्ठ जी ने स्थिर चित्त को विशुद्ध विज्ञान कहा है.
यहां अनुवाद है कि इंद्रियों को वश में करके. जबकि श्लोक कहता है - वशे हि यस्येन्द्रियाणि
यानी इंद्रियां जिसकी वश में हैं.
दोनों में फर्क है. बिना यह फर्क समझे स्थिर चित्त की कुंजी हाथ नहीं लगेगी.
अक्सर लोग श्रीगीताजी के उपदेशों की गलत व्याख्या करते हैं. इद्रिय वश में करने चले तो हजार झंझट होगी. सच्चाई यह है कि करने से इंद्रियां वश में होती भी नहीं. भोग छोड़ने से भोग का आकर्षण नहीं छूट जाता. भोग का आकर्षण छोड़ने के लिए जरूरी है कि भोग का तत्व समझा जाए. जिस दिन हमें तत्व समझ में आ जाए उस दिन भोग अपने आप छूट जाता है.
चित्त की शुद्धि के उपाय हजारों हैं, और ज्ञात हैं. तप, दान, सेवा, निष्काम कर्म चित्त शुद्धि के ही रास्ते हैं. इन रास्तों पर चलते रहे तो धीरे-धीरे भोग की तुच्छता समझ में आने लगती है. और जो तुच्छ हो उसे हम बहुत लंबे समय तक पकड़कर नहीं रख सकते. चाहें तो भी.

।। अलख निरंजन ।।

ब्लॉगर said...

बहुत अच्‍छा प्रयास है। भगवान श्री कृष्‍ण की गीता का प्रचार प्रसाद जितना अधिक किया जाय उतना ही अधिक लाभ प्राप्‍त होता है। आप बधाइ के पात्र है।
शंकर सोनाने
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