Sunday, July 08, 2007

गीता । Gita - भगवद्गीता । Bhagvadgita : अध्याय २: श्लोक ५३-५४ । आत्मानुभूति एवं जिज्ञासा

Chapter 2: Verse 53-54

Subject: Self-realization

विषय: आत्मानुभूति

श्रुतिविप्रतिपन्ना ते यदा स्थास्यति निश्चला।
समाधावचला बुद्धिस्तदा योगमवाप्स्यसि॥२-५३॥


You shall attain self-realisation when your intellect which is wavering due to different doctrines and principles that you have heard ,shall stand  stabilized and steady in the Self.
Lesson: Self-realisation is attained on having the intellect steadily stabilized in the Self.

भांति-भांति के वचनों को सुनने से विचलित हुई तेरी बुध्दि जब परमात्मा में अचल और स्थिर ठहर जाएगी, तब तू योग को प्राप्त हो जाएगा अर्थात तेरा परमात्मा से नित्य संयोग हो जाएगा। ॥५३॥

 

Subject: Curiosity

विषय: जिज्ञासा

Arjuna said:

अर्जुन उवाच।

स्थितप्रज्ञस्य का भाषा समाधिस्थस्य केशव।
स्थितधीः किं प्रभाषेत किमासीत व्रजेत किम्॥२-५४॥


O Keshava, what are the characteristics of a person of steady intellect who is Self-absorbed? How does the person of steady intellect speak; how does he sit; and how does he walk (behave)?
Lesson: Curiosity rises in the pursuit of knowledge.

( स्थिरबुध्दि पुरुष के लक्षण और उसकी महिमा )

अर्जुन उवाच:

अर्जुन बोले- हे केशव! समाधि में स्थित परमात्मा को प्राप्त हुए स्थिरबुध्दि पुरुष का क्या लक्षण है? वह स्थिरबुध्दि पुरुष कैसे बोलता है, कैसे बैठता है और कैसे चलता है? ॥५४॥

 

गीता । Gita - भगवद्गीता । Bhagvadgita - श्रीमद्भगवद्गीता । Srimadbhagvadgita: अध्याय २: श्लोक ५३-५४ । आत्मानुभूति एवं जिज्ञासा

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