Wednesday, July 04, 2007

गीता । Gita - भगवद्गीता । Bhagvadgita - श्रीमद्भगवद्गीता । Srimadbhagvadgita: अध्याय २: श्लोक ४६-४७। कर्मण्येवाधिकारस्ते

Chapter 2: Verse 46-47

Subject: Man of Absolute Knowledge

विषय: ज्ञान की ओर

यावानर्थ उदपाने सर्वतः संप्लुतोदके।
तावान्सर्वेषु वेदेषु ब्राह्मणस्य विजानतः॥२-४६॥


The man of absolute knowledge who has realized the Supreme Self (the Brahman) successfully achieves the entire purpose of life which is described in the Vedas (scriptures). He does not need any thing more, as petty wells are not required when big reservoirs are found.
Lesson: The man of absolute knowledge is not influenced by the ostentatious knowledge (rituals or outward practices) described in Vedas (scriptures).

सब ओर से परिपूर्ण जलाशय के प्राप्त हो जाने पर छोटे जलाशय में मनुष्य का जितना प्रयोजन रहता है, ब्रह्म को तत्व से जानने वाले ब्राह्मण का समस्त वेदों में उतना ही प्रयोजन रह जाता है ॥४६॥

Subject: Right to Perform Duty

विषय: कर्म का ही अधिकार

कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन।
मा कर्मफलहेतुर्भूर्मा ते सङ्गोऽस्त्वकर्मणि॥२-४७॥


Your right is only to perform your duty, but never to its results (fruits). Let not the results be your motive, nor you be indolent.
Lesson: Perform your duty with a mind free from the anxieties of fruits of action. Neither you be indolent nor consider yourself as the cause ( agent) of results.

तेरा कर्म करने में ही अधिकार है, उसके फलों में कभी नहीं। इसलिए तू कर्मों के फल हेतु मत हो तथा तेरी कर्म न करने में भी आसक्ति न हो। ॥४७॥

गीता । Gita - भगवद्गीता । Bhagvadgita - श्रीमद्भगवद्गीता । Srimadbhagvadgita: अध्याय २: श्लोक ४६-४७। कर्मण्येवाधिकारस्ते

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