Thursday, June 28, 2007

श्रीमद्भगवद्गीता । Shrimadbhagvadgita: अध्याय २: श्लोक ३५-३६ । कर्त्तव्य विमुखता

Chapter 2: Verse 35-36

Subject: Escape from Duty

विषय: कर्त्तव्य विमुखता।

भयाद्रणादुपरतं मंस्यन्ते त्वां महारथाः।
येषां च त्वं बहुमतो भूत्वा यास्यसि लाघवम्॥२-३५॥

Those mighty commanders who give you great respect today, when they meet you (on your escape from the battle field), would think of you as worthless and that you have escaped (from duty) out of fear.

Lesson: Escape from duty damages ones public image and his social repute.

हे मधुसूदन! मुझे मारने पर भी अथवा तीनों लोकों के राज्य के लिए भी मैं इन सबको मारना नहीं चाहता, फिर पृथ्वी के लिए तो कहना ही क्या है? ॥३५॥

अवाच्यवादांश्च बहून्वदिष्यन्ति तवाहिताः।
निन्दन्तस्तव सामर्थ्यं ततो दुःखतरं नु किम्॥२-३६॥

Caviling your capability your enemies will speak many unspeakable words about you. What would be more painful than this?
Lesson: Distressing is disreputation and condemnation caused due to escape from duty.

हे जनार्दन! धृतराष्ट्र के पुत्रों को मारकर हमें क्या प्रसन्नता होगी? इन आततायियों को मारकर तो हमें पाप ही लगेगा। ॥३६॥

 

श्रीमद्भगवद्गीता । Shrimadbhagvadgita: अध्याय २: श्लोक ३५-३६ । कर्त्तव्य विमुखता

2 comments:

sunita (shanoo) said...

शुक्रिया मिश्रा जी,...मुझे गीता पढ़ना बेहद पसंद है...अच्छा लगा यहाँ आकर

शानू

RC Mishra said...

शानू जी, धन्यवाद, मेरा प्रयास रहेगा कि मै अनवरत प्रस्तुत करता रहूँ।