Wednesday, June 27, 2007

श्रीमद्भगवद्गीता । Shrimadbhagvadgita: अध्याय २: श्लोक ३३-३४। कर्त्तव्य विमुखता

Chapter 2: Verse 33-34

Subject: Escape from Duty

विषय: कर्त्तव्य विमुखता


अथ चेत्त्वमिमं धर्म्यं संग्रामं न करिष्यसि।
ततः स्वधर्मं कीर्तिं च हित्वा पापमवाप्स्यसि॥३३॥

(And) if you will not fight this righteous war (righteous duty), you shall incur sin besides having lost your own Dharma duty) and reputation.


Lesson: Escape from duty leads to bad reputation and sinful life.

किन्तु यदि तू इस धर्मयुक्त युद्ध को नहीं करेगा तो स्वधर्म और कीर्ति को खोकर पाप को प्राप्त होगा। ॥३३॥

Subject: Disrepute

विषय: अपकीर्ति / कलंकित करना (होना)


अकीर्तिं चापि भूतानि कथयिष्यन्ति तेऽव्ययाम्।
संभावितस्य चाकीर्तिर्मरणादतिरिच्यते॥३४॥

 

The people too shall discuss your disgrace for ever. Such a disgrace to the honoured one (a man of respect), is worse than death.


Lesson: Disrepute is worse than death.

तथा सब लोग तेरी बहुत काल तक रहने वाली अपकीर्ति का भी कथन करेंगे और माननीय पुरुष के लिए अपकीर्ति मरण से भी बढकर है। ॥३४॥

 

श्रीमद्भगवद्गीता । Shrimadbhagvadgita: अध्याय २: श्लोक ३३-३४। कर्त्तव्य विमुखता

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