Tuesday, June 26, 2007

श्रीमद्भगवद्गीता । Shrimadbhagvadgita: अध्याय २: श्लोक ३१-३२ । योद्धा का कर्तव्य

Chapter 2: Verse 31-32

Subject: A Warrior’s Duty

विषय: योद्धा का कर्तव्य।


स्वधर्ममपि चावेक्ष्य न विकम्पितुमर्हसि।
धर्म्याद्धि युद्धाच्छ्रेयोऽन्यत्क्षत्रियस्य न विद्यते॥३१॥

Considering it as your own duty you should not feel frightened. There is nothing better for a Kshatriya (Warrior) than a righteous war.


Lesson: One should not escape from his duty. A warrior’s duty is to fight.

अपने धर्म को देखकर भी तू भय करने योग्य नहीं है अर्थात् तुझे भय नहीं करना चाहिए क्योंकि क्षत्रिय के लिए धर्मयुक्त युध्द से बढकर दूसरा कोई कल्याणकारी कर्तव्य नहीं है। ॥३१॥

 

Subject: Performing Duty

विषय: कर्तव्य निर्वहन

यदृच्छया चोपपन्नं स्वर्गद्वारमपावृतम्।
सुखिनः क्षत्रियाः पार्थ लभन्ते युद्धमीदृशम्॥३२॥


O Partha, Only the fortunate get the privilege of such a battle that comes of itself as an open door to heaven.

Lesson: Only fortunate people get the privilege of performing righteous duty.

हे पार्थ! अपने-आप प्राप्त हुए और खुले हुए स्वर्ग के द्वार रूप इस प्रकार के युद्ध को भाग्यवान क्षत्रिय लोग ही पाते हैं। ॥३२॥

श्रीमद्भगवद्गीता । Shrimadbhagvadgita: अध्याय २: श्लोक ३०-३१ । योद्धा का कर्तव्य

1 comment:

mamta said...

आपके द्वारा भगवद गीता के श्लोक को लिखा जाना एक बहुत ही प्रशंसनीय कार्य है।