Sunday, June 24, 2007

श्रीमद्भगवद्गीता । Shrimadbhagvadgita: अध्याय २: श्लोक २९-३०। आत्मा की प्रकृति

Chapter 2: Verse 29-30

Subject: Nature of the Soul

विषय: आत्मा की प्रकृति


आश्चर्यवत्पश्यति कश्चिदेनम्

आश्चर्यवद्वदति तथैव चान्यः।
आश्चर्यवच्चैनमन्यः शृणोति

श्रुत्वाऽप्येनं वेद न चैव कश्चित्॥२९॥

One perceives the soul as a miracle; and the other hears it as a wonder; and another describes it as a surprise. Yet, having heard about this, none understands what the soul is.

कोई एक महापुरुष ही इस आत्मा को आश्चर्य की भांति देखता है और वैसे ही दूसरा कोई महापुरुष ही इसके तत्व का आश्चर्य की भांति वर्णन करता है तथा दूसरा कोई अधिकारी पुरुष ही इसे आश्चर्य की भांति सुनता है और कोई-कोई तो सुनकर भी इसको नहीं जानता। ॥२९॥

Lesson: Perceive the soul as a reality; not as a miracle.

Subject: The Imperishable

देही नित्यमवध्योऽयं देहे सर्वस्य भारत।
तस्मात्सर्वाणि भूतानि न त्वं शोचितुमर्हसि॥३०॥

O Bharat, this soul, which dwells in the body of all beings, is such that it can not be slain. Therefore, it does not behove of you to grieve for all the beings.

हे अर्जुन! यह आत्मा सबके शरीर में सदा ही अवध्य (जिसका वध नहीं किया जा सके) है। इस कारण सम्पूर्ण प्राणियों के लिए तू शोक करने योग्य नहीं है। ॥३०॥

(क्षत्रिय धर्म के अनुसार युद्ध करने की आवश्यकता का निरूपण)

Lesson: The soul is imperishable and eternal; do not grieve for the perishable beings.

श्रीमद्भगवद्गीता । Shrimadbhagvadgita: अध्याय २: श्लोक २९-३०। आत्मा की प्रकृति

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